लाहौल घाटी में स्थित चंद्रताल नहीं है किसी जन्नत से कम
नई दिल्ली । हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी में स्थित चंद्रताल आपके लिए किसी जन्नत से कम नहीं है। अगर आप घूमने-फिरने के शौकीन हैं और भीड़-भाड़ से दूर पहाड़ों की अनछुई खूबसूरती को महसूस करना चाहते हैं, तो यहां एक बार अवश्य जाइए। समुद्र तल से करीब 14,100 फीट की ऊंचाई पर बसी यह झील अपनी अलौकिक सुंदरता और रहस्यमय माहौल के कारण दुनियाभर के यात्रियों को आकर्षित करती है। बर्फ से ढके ऊंचे पहाड़ों के बीच अर्धचंद्राकार आकार में फैली यह झील ऐसी प्रतीत होती है, मानो प्रकृति ने इसे बड़ी फुर्सत और प्यार से गढ़ा हो। चंद्रताल नाम अपने आप में इसकी पहचान को बयान करता है। ‘चंद्र’ और ‘ताल’ के मेल से बना यह नाम इस झील के चंद्रमा जैसे आकार और उसकी शांत, सौम्य आभा को दर्शाता है। यहां पहुंचते ही समय मानो थम सा जाता है।
चारों ओर फैली खामोशी, ठंडी हवाओं की सरसराहट और पहाड़ों का प्रतिबिंब झील के पानी में ऐसा दृश्य रचता है, जो किसी चित्रकला से कम नहीं लगता। यह जगह जितनी सुंदर है, उतनी ही रहस्यमयी भी है, जो हर यात्री के मन में गहरी छाप छोड़ जाती है। इस झील की सबसे खास बात इसका रंग बदलता पानी है। हिमनदों से आने वाली धाराओं में मौजूद खनिज और सूर्य की रोशनी के अलग-अलग कोण मिलकर ऐसा जादू रचते हैं कि झील का रंग दिन भर बदलता रहता है। सुबह के वक्त इसका पानी हल्के नीले रंग का दिखता है, दोपहर की तेज धूप में यह चमकीले फिरोजा रंग में बदल जाता है और शाम होते-होते गहरे हरे रंग की छटा बिखेरने लगता है। ऐसा महसूस होता है जैसे झील आसमान से संवाद कर रही हो और उसके हर रंग को अपने भीतर समेट रही हो। वैज्ञानिकों के लिए यह एक बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र है, जबकि स्थानीय लोग इसे देवताओं का निवास मानते हैं।चंद्रताल का संबंध पौराणिक कथाओं से भी जोड़ा जाता है।
मान्यता है कि महाभारत काल में पांडवों के सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर को इसी स्थान से देवताओं के राजा इंद्र अपने रथ में बैठाकर स्वर्ग ले गए थे। एक अन्य लोककथा के अनुसार, चंद्र देव और एक अप्सरा आज भी यहां मिलते हैं। शायद यही वजह है कि पूर्णिमा की रात जब चांदनी झील के पानी पर पड़ती है, तो यहां का नजारा किसी दूसरी ही दुनिया का एहसास कराता है। चंद्रताल तक पहुंचना भी अपने आप में एक रोमांचक यात्रा है। मनाली से अटल सुरंग और ग्रामफू होते हुए बटाल तक का सफर यात्रियों को हिमालय की असली चुनौती से रूबरू कराता है। बटाल से आगे झील की पार्किंग तक करीब 14 किलोमीटर का कच्चा और कठिन रास्ता है, जहां आम गाड़ियां नहीं चल पातीं और सिर्फ मजबूत वाहन ही पहुंच पाते हैं।

पीएम आवास योजना से बना ग्वालिन के सपनों का आशियाना
मध्यप्रदेश पुलिस की वाहन चोरों पर प्रभावी कार्यवाही
शासकीय स्कूलों के प्रति अभिभावकों और बच्चों का बढ़ा आकर्षण: मुख्यमंत्री डॉ. यादव
मायावती लखनऊ से चुनावी शंखनाद करेंगी, BSP के सामने चुनौती का पहाड़
हर घर नल-जल से बिराजपाली के ग्रामीणों को कठिनाईयों से मिली निजात